Health Desk: बचपन में ज्यादा फैट और शुगर वाला खाना खाने की आदत दिमाग पर लंबे समय तक असर डाल सकती है। एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि बचपन के दौरान अधिक मात्रा में जंक फूड खाने से दिमाग के उन हिस्सों में स्थायी बदलाव हो सकते हैं, जो भूख, ऊर्जा संतुलन और खाने की आदतों को नियंत्रित करते हैं। शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि आंत में मौजूद कुछ लाभकारी बैक्टीरिया और प्रीबायोटिक फाइबर इन प्रभावों को आंशिक रूप से कम करने में मदद कर सकते हैं।

Read more: स्वाद के चक्कर में कहीं गंवा न दें सेहत, जंक फूड से हो सकती हैं ये 5 बीमारियां!

यह अध्ययन यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क के वैज्ञानिकों ने किया है। शोध के अनुसार, यदि बचपन में लगातार हाई फैट और हाई शुगर वाली डाइट ली जाए, तो बाद में खानपान में सुधार करने के बावजूद उसके प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं होते। यानी बचपन की खानपान संबंधी आदतें भविष्य में भी दिमाग और व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।

जंक फूड से बदल सकता है दिमाग का व्यवहार

शोधकर्ताओं ने बताया कि आज के समय में बच्चे प्रोसेस्ड और जंक फूड से हर तरफ घिरे हुए हैं। ऐसे खाद्य पदार्थ आसानी से उपलब्ध होते हैं और उनका बड़े पैमाने पर प्रचार भी किया जाता है। जन्मदिन की पार्टियों, स्कूलों और खेल गतिविधियों के दौरान भी इस तरह का भोजन आम हो गया है, जिससे बचपन से ही बच्चों की खानपान संबंधी आदतें प्रभावित होने लगती हैं।

अध्ययन में पाया गया कि कम पोषक तत्व लेकिन अधिक कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ बचपन में खाने से दिमाग में ऐसे बदलाव हो सकते हैं, जो आगे चलकर खाने के व्यवहार को स्थायी रूप से प्रभावित करते हैं। इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने प्रयोगात्मक माउस मॉडल का इस्तेमाल किया। जिन चूहों को बचपन में हाई फैट और हाई शुगर वाली डाइट दी गई, उनमें बड़े होने के बाद भी खाने के व्यवहार में बदलाव बने रहे।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, ये बदलाव दिमाग के हाइपोथैलेमस हिस्से से जुड़े पाए गए, जो भूख और शरीर के ऊर्जा संतुलन को नियंत्रित करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के बदलाव आगे चलकर मोटापे और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा सकते हैं।

आंत के अच्छे बैक्टीरिया से मिल सकती है राहत

अध्ययन में यह भी सामने आया कि आंत के माइक्रोबायोम में सुधार करके इन प्रभावों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने बिफिडोबैक्टीरियम लॉन्गम APC1472 नामक लाभकारी बैक्टीरिया और एफओएस (FOS) तथा जीओएस (GOS) जैसे प्रीबायोटिक फाइबर का परीक्षण किया।

ये प्रीबायोटिक फाइबर प्राकृतिक रूप से प्याज, लहसुन, केला और एस्पेरेगस जैसे खाद्य पदार्थों में पाए जाते हैं। अध्ययन के नतीजों से पता चला कि लाभकारी बैक्टीरिया खाने के व्यवहार पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, जबकि प्रीबायोटिक फाइबर आंत के माइक्रोबायोम में व्यापक सुधार लाने में मदद करते हैं।

शोधकर्ताओं का मानना है कि बचपन में संतुलित और पौष्टिक भोजन की आदत विकसित करना न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद जरूरी है। साथ ही, आंत के स्वास्थ्य का ध्यान रखकर भविष्य में खानपान से जुड़ी कई समस्याओं के जोखिम को कम किया जा सकता है।

Share.
Exit mobile version