Ranchi: कानून और वर्दी का बुनियादी दायित्व समाज के अंतिम और सबसे लाचार व्यक्ति को सुरक्षा की गारंटी देना है, लेकिन जब सुरक्षा देने वाले ही अपनी ताकत के नशे में भक्षक बन जाएं, तो न्याय की पूरी व्यवस्था हिल जाती है। झारखंड के हजारीबाग स्थित डिटेंशन सेंटर में बंद एक विदेशी (बांग्लादेशी) महिला के साथ घटी रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना ने खाकी की कार्यप्रणाली और सरकारी व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत द्वारा आपराधिक आरोपों से बरी किए जाने के बावजूद अवैध रूप से हिरासत में रखी गई एक लाचार महिला के साथ वहां तैनात तीन पुलिसकर्मियों ने सामूहिक दुष्कर्म की घिनौनी वारदात को अंजाम दिया।
यह सनसनीखेज मामला तब प्रकाश में आया जब जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा) ने झारखंड उच्च न्यायालय के समक्ष एक सीलबंद जांच रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उजागर हुआ कि ड्यूटी पर तैनात तीन कांस्टेबलों ने हिरासत में बंद महिला की बेबसी का फायदा उठाते हुए उसके साथ जबरन शारीरिक दुराचार किया।
वर्दी की आड़ में दरिंदगी, पुलिस की नकारात्मक छवि पर करारा तमाचा
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पुलिस को कानून का पहरुआ और संकटमोचक माना जाता है। लेकिन इस भयावह प्रकरण ने एक बार फिर पुलिस महकमे के भीतर जड़ें जमा चुकी संवेदनहीनता, सत्ता के दुरुपयोग और संस्थागत बर्बरता को बेनकाब कर दिया है:
- सत्ता और पद का घिनौना दुरुपयोग: डिटेंशन सेंटर में बंद कैदी या बंदी पूरी तरह राज्य की दया और पहरेदारों की निगरानी पर निर्भर होते हैं। उस चारदीवारी के भीतर तीन हथियारबंद पुलिसकर्मियों द्वारा एक निहत्थी, विदेशी और कानूनी रूप से बरी महिला का यौन शोषण करना वर्दी के विश्वास पर सबसे बड़ा विश्वासघात है।
- लाचारी का अनुचित लाभ उठाना: महिला दूसरे देश की नागरिक थी, जिसका कोई स्थानीय पारिवारिक सहारा नहीं था। पुलिसकर्मियों ने सोचा कि चारदीवारी के भीतर होने वाली इस दरिंदगी की आवाज बाहर नहीं जाएगी और कोई उसकी सुध लेने वाला नहीं है। यह मानसिकता पुलिस तंत्र के अमानवीय और क्रूर चेहरे को उजागर करती है।
- सिस्टम द्वारा बचाव की कोशिश: मामले में जब प्राथमिकी दर्ज की गई, तब भी पुलिस प्रशासन ने लीपापोती की कोशिश की। एफआईआर में बेहद कमजोर धाराएं लगाई गईं, जिस पर हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने कड़ी फटकार लगाई। अदालत के कड़े रुख के बाद ही राज्य के महाधिवक्ता को यह आश्वासन देना पड़ा कि एफआईआर में गंभीर व गैर-जमानती धाराएं जोड़ी जाएंगी। यह रवैया स्पष्ट करता है कि विभाग अपने दोषी सहकर्मियों को बचाने के लिए किस हद तक जा सकता है।
दोषी पुलिसकर्मियों को क्या सजा होगी ?
भारतीय न्याय व्यवस्था में कस्टोडियल रेप यानी हिरासत में किसी लोकसेवक (विशेष रूप से पुलिस अधिकारी) द्वारा किए गए बलात्कार को साधारण दुष्कर्म से कहीं अधिक जघन्य माना गया है। कानूनन, पुलिस हिरासत में होने वाले यौन शोषण में पीड़िता की सहमति का कोई औचित्य नहीं होता और इसे कानून की सर्वोच्च अवमानना माना जाता है।
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(a) और नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64(2)(a) व 64(2)(e) विशेष रूप से पुलिसकर्मियों और कस्टडी के प्रभारी कर्मियों द्वारा किए जाने वाले दुष्कर्म के लिए कड़े दंड का प्रावधान करती हैं:
- कस्टोडियल गैंगरेप का अपराध: क्योंकि इस वारदात में तीन पुलिसकर्मियों की प्रत्यक्ष संलिप्तता सामने आई है, इसलिए यह कस्टोडियल गैंगरेप (सामूहिक दुष्कर्म) का संगीन मामला बनता है।
- सजा का कड़ा प्रावधान: इस कानून के तहत यदि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र, थाने, या हिरासत स्थल में किसी महिला के साथ दुष्कर्म किया जाता है, तो इसके लिए न्यूनतम 10 वर्ष के सश्रम कारावास का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर आजीवन कारावास तक किया जा सकता है। इसके साथ ही दोषियों पर भारी जुर्माना भी लगाया जाता है, जिसे पीड़िता को मुआवजे के रूप में दिया जाता है।
- सबूत का भार पुलिसकर्मियों पर: भारतीय साक्ष्य संहिता की धारा 114A के तहत, यदि पीड़िता यह बयान देती है कि उसने संभोग के लिए सहमति नहीं दी थी, तो अदालत यही मानकर चलती है कि सहमति नहीं थी। अब तीनों पुलिसकर्मियों को यह साबित करना होगा कि वे निर्दोष हैं।
- विभागीय कार्रवाई और बर्खास्तगी: निलंबन के बाद विभागीय जांच पूरी होने पर इन तीनों पुलिसकर्मियों को पुलिस सेवा से स्थायी रूप से बर्खास्त किया जाएगा, जिससे वे आजीवन किसी भी सरकारी पद या पेंशन के हकदार नहीं रहेंगे।
उच्च न्यायालय का कड़ा रुख और न्याय की उम्मीद
झारखंड हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले में संवेदनशीलता और सख्ती की नई नजीर पेश की है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी विदेशी नागरिक को, भले ही वह अवैध रूप से देश में आया हो, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मानवीय गरिमा और जीवन की सुरक्षा का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
अदालत ने सरकार को पीड़िता को तत्काल प्रोबेशन होम भेजने, सर्वोत्तम चिकित्सा सहायता प्रदान करने और राज्य के सभी चार डिटेंशन सेंटरों व एनजीओ द्वारा संचालित महिला शेल्टर होम की स्थिति पर 19 नवंबर तक समग्र रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस प्रशासन अपने ही विभाग के इन दरिंदों को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर पीड़िता को कितना त्वरित न्याय दिला पाता है।



