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विश्व आदिवासी दिवस का शंखनाद, 33 जनजातियों की सांस्कृतिक झलक और पांचवीं अनुसूची का संवैधानिक मंथन

विश्व आदिवासी दिवस पर झारखंड में भव्य तैयारियां, राजभवन से लेकर 24 जिलों के समाहरणालय तक प्रशासनिक मुस्तैदी, 33 जनजातियों का सांस्कृतिक महासंगम

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रांची: झारखंड की धरा एक बार फिर अपनी पौराणिक संस्कृति, समृद्ध परंपराओं और ऐतिहासिक आदिवासी अस्मिता के उत्सव को मनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। 9 अगस्त को मनाए जाने वाले ‘विश्व आदिवासी दिवस’ (International Day of the World’s Indigenous Peoples) को लेकर समूचे राज्य में उत्सव जैसा माहौल है। राजधानी रांची से लेकर राज्य के सुदूर ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों तक तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस वर्ष का आयोजन न केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और कला-प्रदर्शनी तक सीमित है, बल्कि यह आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, जल-जंगल-जमीन के संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का एक बड़ा मंच बनने जा रहा है।

राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार के दिशा-निर्देश और विचार

झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर जनजातीय समाज के विकास और उनके संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण पर विशेष बल दिया है। राज्यपाल ने हाल ही में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान यह स्पष्ट किया कि झारखंड की पहचान यहां के वीरों और जनजातीय परंपराओं से है। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, वीर बुधु भगत, सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो और जतरा उरांव जैसे महापुरुषों ने जिस मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया, उसकी सांस्कृतिक विरासत को सहेजना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
राज्यपाल गंगवार ने जनजातीय समाज के युवाओं से उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर होने का आह्वान किया है। उन्होंने देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संघर्षपूर्ण जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि शिक्षा ही वह शक्ति है जो किसी भी समाज को सामाजिक और आर्थिक प्रगति की नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है।
राज्यपाल ने आदिवासी समाज की अनूठी सामाजिक व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि जनजातीय समुदाय में दहेज-प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियां नहीं हैं, जो संपूर्ण आधुनिक समाज के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। हालांकि, उन्होंने डायन-प्रथा जैसी कुरीतियों के समूल उन्मूलन के लिए व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अतिरिक्त, राज्यपाल ने राज्य में जनजातीय पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और पेसा (PESA – Panchayat Extension to Scheduled Areas) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर भी अपने विचार साझा किए, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम व्यक्ति तक लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों का लाभ पहुंचे।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुवाई में राज्य स्तरीय भव्य आयोजन

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कुशल नेतृत्व में झारखंड सरकार इस बार विश्व आदिवासी दिवस को बेहद खास और ऐतिहासिक बनाने में जुटी हुई है। राजधानी रांची का ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान और भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान सह संग्रहालय इस दो दिवसीय राजकीय ‘झारखंड आदिवासी महोत्सव’ के मुख्य केंद्र बने हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आयोजन की रूपरेखा तय करते हुए अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि कार्यक्रम में राज्य के कोने-कोने से आने वाले जनजातीय प्रतिनिधियों, कलाकारों और आम नागरिकों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनजातीय सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में से एक है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व बनाकर जीने की जो कला आदिवासी समाज के पास है, वह आज संपूर्ण विश्व को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है।
राज्य सरकार द्वारा आयोजित इस दो दिवसीय महाकुंभ में केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों (जैसे ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम, असम, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश) से 5,000 से अधिक आदिवासी कलाकार, लोक नर्तक और बुद्धिजीवी भाग ले रहे हैं। मुख्यमंत्री की पहल पर इस वर्ष का समारोह दिशोम गुरु शिबू सोरेन और अमर शहीदों की पावन स्मृतियों को भी समर्पित किया जा रहा है।
इस महोत्सव में जनजातीय व्यंजनों के पारंपरिक स्टॉल, हस्तशिल्प प्रदर्शनी, सोहराय, कोहबर, जादूपटिया और डोकरा कलाकृतियों की लाइव पेटिंग प्रदर्शनी लगाई जा रही है। साथ ही ट्राइबल फिल्म फेस्टिवल और ट्राइबल फैशन शो जैसे आधुनिक आयोजनों के जरिए आदिवासी संस्कृति और सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। मोरहाबादी मैदान से बिरसा चौक तक एक भव्य और ऐतिहासिक ‘जतरा’ (शोभायात्रा) की योजना भी तैयार की गई है, जिसमें विभिन्न जनजातियों के नृत्य दल अपने पारंपरिक परिधानों में शामिल होंगे।

24 जिलों के उपायुक्तों (DCs) की प्रशासनिक तैयारियां

राज्य सरकार के निर्देशों के आलोक में झारखंड के सभी 24 जिलों के उपायुक्त (District Commissioners) अपने-अपने जिलों में विश्व आदिवासी दिवस के सफल आयोजन के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, दुमका, जामताड़ा, पाकुड़, साहिबगंज, लातेहार, लोहरदगा, पलामू, गढ़वा, हजारीबाग, रामगढ़, चतरा, गिरिडीह, बोकारो, धनबाद, देवघर, गोड्डा, कोडरमा और सरायकेला-खरसावां सभी जिला मुख्यालयों में विशेष आयोजनों की रूपरेखा बनाई गई है।
  • सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था: सभी जिलों के उपायुक्तों ने पुलिस अधीक्षकों (SPs) के साथ समीक्षा बैठकें कर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों और कार्यक्रम स्थलों पर अतिरिक्त पुलिस बल तथा सीसीटीवी कैमरों की तैनाती की गई है।
  • निःशुल्क स्टॉल व परिसंपत्ति वितरण: जिला स्तर पर स्वयं सहायता समूहों (SHGs), हस्तशिल्पियों और आदिवासी उद्यमियों के लिए दर्जनों निःशुल्क स्टॉल आवंटित किए गए हैं। इसके साथ ही, राज्य सरकार की ‘अबुआ आवास योजना’, ‘मुख्यमंत्री ग्राम गाड़ी योजना’ और ‘वन अधिकार पट्टा’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं के तहत लाभान्वितों के बीच परिसंपत्तियों का वितरण किया जाएगा।
  • पेयजल, स्वास्थ्य व यातायात प्रबंधन: आयोजन स्थलों पर पेयजल टैंकर, चलंत शौचालय, एम्बुलेंस और मेडिकल टीमों की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है, ताकि भारी भीड़ के बीच आम नागरिकों को परेशानी न हो।
  • ब्लॉक व पंचायत स्तर पर कार्यक्रम: केवल जिला मुख्यालय ही नहीं, बल्कि प्रखंड (Block) और पंचायत स्तर पर भी प्रभात फेरी, खेलकूद प्रतियोगिताएं और निबंध व चित्रकला प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है।

झारखंड की 33 जनजातियों की भागीदारी और सांस्कृतिक संगम

झारखंड की सांस्कृतिक विविधता की रीढ़ यहां की जनजातियां हैं। राज्य में कुल 33 अनुसूचित जनजातियां (Scheduled Tribes) निवास करती हैं, जिनमें 8 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs – Particularly Vulnerable Tribal Groups) शामिल हैं। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर ये सभी 33 जनजातीय समुदाय अपनी अनूठी सांस्कृतिक पहचान के साथ एक मंच पर आ रहे हैं।
  1. प्रमुख कृषक व बहुल जनजातियां: संथाल (राज्य की सबसे बड़ी जनजाति), उरांव (कुड़ुख), मुंडा, हो, चेरो, खरवार, और भूमिज समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा, धोती-पारंपरिक गमछा और पंछी-पड़हा पोशाक में शिरकत करेंगे।
  2. शिल्पकार व कारीगर जनजातियां: महली (बांस शिल्प), लोहरा व करमाली (लोह कला), और चिक बड़ाइक (बुनाई व कपड़ा कला) समुदाय अपनी पारंपरिक कलाकृतियों का जीवंत प्रदर्शन करेंगे।
  3. आदिम जनजातीय समूह (PVTGs): असुर (प्राचीन धातु शोधक), बिरहोर (यायावर/रस्सी निर्माण), कोरवा, बिरजिया, परहिया, सबर, माल पहाड़िया और शौरिया पहाड़िया समुदाय के लोग भी अपनी अनूठी जीवनशैली, जड़ी-बूटी ज्ञान और लोककला को प्रदर्शित करेंगे।
  4. अन्य जनजातीय समूह: बंजारा, बथुड़ी, बिनझिया, गोंड, गोड़ैत, कंवार, खोंड, किसान, कोरा, कोल आदि समुदाय भी पारंपरिक मांदर, नगाड़ा, बनम, बांसुरी, ढाक और भेर की थाप पर अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे।
इस आयोजन में ‘जनी शिकार’ जैसी दुर्लभ और ऐतिहासिक परंपराओं का प्रदर्शन भी किया जाएगा, जो आदिवासी महिलाओं के साहस और नेतृत्व क्षमता का प्रतीक है।

पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत झारखंड क्षेत्र एवं उनका प्रशासन

विश्व आदिवासी दिवस के इस पावन अवसर पर भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) और इसके तहत झारखंड में लागू प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यापक विमर्श किया जा रहा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 244(1) देश के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन तथा नियंत्रण के लिए विशेष प्रावधान करता है।
  • झारखंड में पांचवीं अनुसूची का विस्तार: झारखंड के 24 जिलों में से 15 जिले पूर्ण या आंशिक रूप से पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। राज्य के कुल 260 प्रखंडों में से 112 प्रखंड अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत घोषित हैं। इन क्षेत्रों में जनजातीय आबादी की बहुलता है और इनके सांस्कृतिक व भूमि संबंधी अधिकारों की रक्षा करना संविधान का मुख्य ध्येय है।
  • राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियां: पांचवीं अनुसूची के तहत राज्य के राज्यपाल को विशेष शक्तियां प्राप्त हैं। राज्यपाल राज्य विधानमंडल या संसद के किसी भी कानून को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू करने या संशोधनों के साथ लागू करने के संबंध में निर्देश जारी कर सकते हैं। राज्यपाल प्रतिवर्ष राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट सौंपते हैं।
  • जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council – TAC): संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत झारखंड में जनजातीय सलाहकार परिषद का गठन किया गया है। 20 सदस्यीय इस परिषद में जनजातीय विधायकों और विशेषज्ञों का बहुमत होता है, जो राज्य में जनजातीय कल्याण और विकास योजनाओं पर सरकार तथा राज्यपाल को सलाह देती है।
  • पारंपरिक स्वशासन व्यवस्थाएं: पांचवीं अनुसूची का मूल उद्देश्य आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन प्रणालियों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करना है। झारखंड में विभिन्न जनजातियों की अपनी ऐतिहासिक स्वशासन प्रणालियां संचालित हैं—
    • माझी-परगना व्यवस्था: संथाल समुदाय की पारंपरिक प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था।
    • पढ़हा-राजा व्यवस्था: उरांव (कुड़ुख) समाज की त्रिस्तरीय स्वशासन प्रणाली।
    • मुंडा-मानकी व्यवस्था: हो और मुंडा समुदाय की पारंपरिक शासन प्रणाली।
    • डोकलो-सोहोर व्यवस्था: खड़िया समाज की पारंपरिक सामाजिक-प्रशासनिक व्यवस्था।
  • पेसा (PESA) अधिनियम 1996: पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को स्वायत्तता देने के लिए ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996’ (PESA) लागू किया गया है। इसके तहत जल, जंगल, जमीन, लघु खनिज, और स्थानीय बाजारों पर ग्राम सभा का नियंत्रण होता है। झारखंड में पेसा नियमों को पूरी तरह लागू करने और मजबूत करने की मांग इस आदिवासी दिवस का एक मुख्य एजेंडा बनी हुई है।
झारखंड में विश्व आदिवासी दिवस केवल एक उत्सव भर नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के संघर्ष, स्वाभिमान, जल-जंगल-जमीन के प्रति उनकी आस्था और संवैधानिक अधिकारों के प्रति एकजुटता का प्रतीक है। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार के संवैधानिक मार्गदर्शन, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के रणनीतिक क्रियान्वयन, 24 जिलों के प्रशासनिक तंत्र की तत्परता और राज्य की सभी 33 जनजातियों के सक्रिय योगदान से यह आयोजन झारखंड की समृद्ध संस्कृति को पूरे विश्व के मानचित्र पर स्थापित करने में मील का पत्थर साबित होगा।
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