World News: संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ताज़ा रिपोर्ट ने गर्भनिरोधक साधनों के वैश्विक उपयोग को लेकर कई अहम तथ्य उजागर किए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार चीन अब उन शीर्ष दस देशों की सूची में शामिल हो गया है जहां महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों का सबसे अधिक इस्तेमाल कर रही हैं। यह उपलब्धि चीन के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि एशिया में वह एकमात्र देश है जिसने इस सूची में जगह बनाई है। दूसरी ओर, भारत की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है और वह इस सूची में 57वें स्थान पर है।

रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी देशों जैसे फिनलैंड, स्विट्ज़रलैंड, कनाडा और ब्रिटेन में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं गर्भनिरोधक का उपयोग करती हैं। इन देशों की महिलाओं में लंबे समय से परिवार नियोजन के साधनों के प्रति जागरूकता और उपलब्धता का स्तर ऊंचा रहा है। अब चीन भी इसी पंक्ति में खड़ा दिख रहा है। वहां पर गर्भनिरोधक उपयोग की दर लगभग 70 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। यह दर न केवल एशियाई देशों के लिए एक मिसाल है बल्कि यह भी साबित करती है कि सरकार की नीतियां और परिवार नियोजन पर दिया गया जोर किस तरह सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

भारत की स्थिति इस मामले में पीछे दिखाई देती है। यहां करीब आधी महिलाएं यानी लगभग 50 प्रतिशत ही गर्भनिरोधक गोलियों या अन्य साधनों का इस्तेमाल करती हैं। भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रमों की शुरुआत कई दशक पहले हुई थी, लेकिन आज भी ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सामाजिक परंपराएं और जागरूकता का अभाव गर्भनिरोधक उपयोग में बड़ी बाधाएं हैं। शहरी क्षेत्रों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन पूरे देश के औसत को देखते हुए भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

भारत में हाल के वर्षों में सरकार ने परिवार नियोजन को लेकर कई कदम उठाए हैं। पीडीएचएस 2017-18 के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 3.2 दर्ज की गई थी और गर्भनिरोधक उपयोग की दर 34 प्रतिशत थी। 2025 तक इस दर को 60 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने, महिलाओं को जागरूक बनाने और विभिन्न प्रकार के गर्भनिरोधक साधनों की आसान उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक चेतावनी और अवसर दोनों की तरह है। यदि भारत को वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करनी है तो उसे गर्भनिरोधक साधनों को हर महिला तक पहुंचाना होगा और सामाजिक सोच में भी बदलाव लाना होगा। जब तक ग्रामीण और पिछड़े इलाकों की महिलाओं को शिक्षित और जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक भारत चीन और अन्य विकसित देशों की बराबरी नहीं कर पाएगा।

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