Patna: बिहार की सियासत में एक युग का अंत और नए अध्याय की शुरुआत होने जा रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होते ही उनके इस्तीफे का ‘काउंटडाउन’ शुरू हो चुका है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि नीतीश अपनी मौजूदा ‘समृद्धि यात्रा’ पूरी करते ही मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे देंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि 15 अप्रैल तक बिहार में बीजेपी के नेतृत्व वाली नई सरकार शपथ ले सकती है।

इस्तीफे का कानूनी गणित

जन प्रतिनिधित्व कानून के अनुसार, कोई भी व्यक्ति एक साथ दो सदनों का सदस्य नहीं रह सकता। नीतीश कुमार 16 मार्च को राज्यसभा के लिए चुने गए हैं, जबकि वह पहले से बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं। नियमानुसार, उन्हें 14 दिनों के भीतर यानी 30 मार्च तक किसी एक सदन से इस्तीफा देना होगा। हालांकि, वे तकनीकी रूप से इस्तीफा देने के बाद भी 6 महीने तक सीएम बने रह सकते हैं, लेकिन बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व चाहता है कि पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले बिहार की कमान उनके हाथों में आ जाए।

बीजेपी की 20 साल पुरानी मुराद होगी पूरी

साल 2005 से बिहार में एनडीए की सरकार चल रही है, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी हमेशा जेडीयू के पास ही रही। बीजेपी दो बार सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद गठबंधन की मर्यादा के कारण सीएम पद से वंचित रही। अब नीतीश के दिल्ली जाने के फैसले के साथ ही बीजेपी का यह लंबा इंतजार खत्म होने वाला है। यह पहली बार होगा जब बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विशुद्ध रूप से बीजेपी का कोई नेता बैठेगा।

कौन होगा बिहार का नया ‘सम्राट’?

मुख्यमंत्री की रेस में कई दिग्गज नाम तैर रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भरोसेमंद और यादव समाज के बड़े नेता नित्यानंद राय का नाम चर्चा में है, जो लालू यादव के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं। वहीं, डिप्टी सीएम विजय सिन्हा और दिलीप जायसवाल के नाम भी कतार में हैं। लेकिन सबसे प्रबल दावेदार सम्राट चौधरी माने जा रहे हैं।

बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व और अमित शाह की पहली पसंद सम्राट चौधरी ही हैं। ओबीसी चेहरे के रूप में उनकी पहचान बिहार के जातीय समीकरणों में फिट बैठती है। बीजेपी उन्हें सीएम बनाकर न केवल बिहार के पिछड़ा वर्ग को साधना चाहती है, बल्कि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के चुनावों में भी एक बड़ा संदेश देना चाहती है।

बंगाल चुनाव और बीजेपी की रणनीति

बीजेपी का मानना है कि बिहार में पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री और नितिन नबीन जैसे कायस्थ नेता को संगठन की कमान सौंपने से बंगाल के बुद्धिजीवी और पिछड़े समाज में पार्टी की पैठ मजबूत होगी। फिलहाल, पूरा बिहार 15 अप्रैल की उस तारीख का इंतजार कर रहा है, जब सत्ता की चाबी अधिकारिक रूप से बीजेपी के हाथों में होगी।

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