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कचरा बना खजाना: थर्मोकोल से 50 टन दाना तैयार, यूपी-झारखंड में भारी डिमांड

पटना के अलावलपुर में थर्मोकोल कचरे से हर महीने 50 टन दाना तैयार कर यूपी-झारखंड तक सप्लाई किया जा रहा है, जिससे प्रतिमाह 17 लाख रुपये से अधिक का कारोबार खड़ा हुआ है।
थर्मोकोल अपशिष्ट प्रबंधन

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Patna: बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (LSBA) और स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की पहल से राजधानी पटना के खुशरूपुर प्रखंड स्थित अलावलपुर पंचायत में अपशिष्ट प्रबंधन की अनूठी मिसाल कायम की गई है।

क्या है अलावलपुर का थर्मोकोल मॉडल?

पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती माने जाने वाले थर्मोकोल कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण करते हुए यहां हर महीने 40 से 50 टन थर्मोकोल दाना (ग्रैन्यूल्स) तैयार किया जा रहा है। कभी अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाइयों के लिए सिरदर्द साबित होने वाला यह कचरा अब लगभग 17.50 लाख रुपये मासिक कारोबार वाले सफल उद्योग मॉडल में बदल चुका है, जिसकी मांग बिहार के अलावा झारखंड और उत्तर प्रदेश तक पहुंच गई है।

कैसे शुरू हुआ कचरे से दाना बनाने का सफर?

हल्का और अधिक जगह घेरने के कारण पूर्व में थर्मोकोल कचरे के निस्तारण और भंडारण में काफी कठिनाई आती थी। इस समस्या को सुलझाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन की प्रखंड क्रियान्वयन समिति ने स्थानीय कबाड़ व्यवसायी ‘ब्रदर प्लास्टिक्स’ के संचालक दीपक कुमार को इसके पुनर्चक्रण के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2017 में कचरा केंद्रों से थर्मोकोल खरीदकर पहले लम्प्स बनाए गए, फिर 2023 से आधुनिक मशीनों के माध्यम से सीधे उच्च गुणवत्ता वाले दाने बनाने की शुरुआत हुई। वर्तमान में यह इकाई पटना के 8, रांची के 2 और वाराणसी के 1 कबाड़ी से नियमित रूप से कच्चा माल खरीद रही है।

तकनीक और स्थानीय रोजगार का सृजन कैसे?

पुनर्चक्रण प्रक्रिया के तहत अपशिष्ट को पहले छोटे टुकड़ों में तोड़कर पिघलाया जाता है, जिससे ठोस लम्प्स तैयार होते हैं। इसके बाद ग्राइंडिंग मशीन से बारीक पाउडर बनाकर उसमें आवश्यक रसायन मिलाए जाते हैं और फिर एक्सट्रूडर मशीन के जरिए मोटे रेशे खींचकर छोटे-छोटे दानों में काटा जाता है। इन दानों का इस्तेमाल दोबारा नई थर्मोकोल शीट के निर्माण में होता है। 35,000 रुपये प्रति टन की दर से बिकने वाले इस उत्पाद से न केवल पर्यावरण संरक्षण हो रहा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर 12 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार भी मिला है।

सरकार का वेस्ट टू वेल्थ पर क्या विजन है?

ग्रामीण विकास तथा सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री श्रवण कुमार ने बताया कि राज्य सरकार प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन को मिशन मोड में आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि सीतामढ़ी में सिंगल यूज़ प्लास्टिक से बनी बेंच की सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं। राज्य में प्लास्टिक कचरे से पेवर ब्लॉक, टाइल्स, गमले और सड़क निर्माण सामग्री बनाई जा रही है। अलावलपुर में थर्मोकोल कचरे से दाना तैयार करने की यह पहल सर्कुलर इकोनॉमी और ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में ठोस कदम है, जो बिहार को पर्यावरण संरक्षण और रीसाइक्लिंग उद्योग में अग्रणी बना रही है।

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