Patna: बिहार का हथकरघा उद्योग राज्य की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्पकला और स्थानीय रोजगार का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। भागलपुरी सिल्क से लेकर गया के पटवा टोली और नालंदा के नेपुरा तक बुनकर अपनी पारंपरिक कला को नई तकनीक और सरकारी सहयोग के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बुनकरों को वित्तीय सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।
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बिहार के किन क्षेत्रों की बुनकरी है खास?

अध्यक्ष मगध बुनकर कल्याण सेवा समिति उपाध्यक्ष नागरिक परिषद गया जी।
भागलपुरी सिल्क अपनी गुणवत्ता और आकर्षक बनावट के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। मधुबनी पारंपरिक डिजाइनों के लिए जानी जाती है, जबकि गया के पटवा टोली में सूती और आधुनिक धागों से विभिन्न प्रकार के वस्त्र तैयार किए जाते हैं। नालंदा के नेपुरा और बिहारशरीफ क्षेत्र टसर सिल्क, मटका सिल्क और सूती वस्त्रों की बुनाई के लिए विशेष पहचान रखते हैं।
इन केंद्रों के उत्पाद न केवल बिहार की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं, बल्कि स्थानीय कारीगरों की आजीविका और राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देते हैं।
महिलाओं और बुनकरों को कैसे मिल रहा लाभ?
हथकरघा उद्योग में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। भागलपुर की प्रीति ने पार्वती जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़कर पारंपरिक रेशम बुनाई को संगठित व्यवसाय का रूप दिया। उन्हें 60 हजार रुपये का ऋण, प्रशिक्षण और बाजार संबंधी सहयोग मिला, जिसके बाद उन्होंने अपने उद्यम का विस्तार किया।
प्रीति के उत्पादों को पटना के सरस मेला, दिल्ली हाट और झारखंड हस्तशिल्प मेला जैसे आयोजनों में सराहना मिली। उनके अनुसार, वह प्रतिमाह 20 से 25 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं और 10 से अधिक स्थानीय महिलाओं को रोजगार दे रही हैं।
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गया के पटवा टोली को बिहार के वस्त्र उद्योग का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां गमछा, बेडशीट, धोती, पीतांबरी और गद्दे के खोल का बड़े पैमाने पर निर्माण होता है। स्थानीय कारोबारी प्रेम नारायण पटवा के अनुसार, उनके यहां 40 से 50 मजदूर कार्यरत हैं और प्रतिदिन 2 से 3 लाख रुपये का सामान पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड भेजा जाता है। वहीं मगध बुनकर कल्याण सेवा समिति के अध्यक्ष प्रकाश राम पटवा के अनुसार, पटवा टोली में लगभग 11 हजार पावरलूम, एक हजार औद्योगिक इकाइयां और सैकड़ों हैंडलूम संचालित हैं, जिनसे करीब 15 हजार परिवारों को रोजगार मिला है।
सरकारी योजनाओं से कैसे मिल रहा प्रोत्साहन?
भागलपुर में 5.28 करोड़ रुपये की लागत से मेगा हथकरघा क्लस्टर विकसित किया गया है। इसके अंतर्गत आधुनिक डाई हाउस, डिजाइन स्टूडियो, उत्पाद विकास केंद्र और 10 ब्लॉक स्तरीय क्लस्टर स्थापित किए गए हैं।
बिहार सरकार बुनकर मुद्रा योजना, राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम, हथकरघा संवर्धन सहायता और कच्चा माल सहायता योजना के माध्यम से ऋण, प्रशिक्षण, आधुनिक करघे, उपकरण और गुणवत्तापूर्ण धागा उपलब्ध करा रही है। साथ ही GeM और इंडिया हैंडमेड पोर्टल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा विभिन्न मेलों के माध्यम से बुनकरों को बाजार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
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विभाग के अनुसार, बुनकर मुद्रा योजना के तहत वर्ष 2023-24 में 32 बुनकरों को 23.90 लाख रुपये तथा वर्ष 2025-26 में 7 बुनकरों को 8.50 लाख रुपये का रियायती ऋण उपलब्ध कराया गया।
हथकरघा उत्पाद कहां खरीद सकते हैं?
बिहार के हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पाद खरीदने के लिए पटना हैंडलूम हाट, खादी मॉल, बिहार संग्रहालय और आर्ट एंड क्राफ्ट की दुकानों पर विभिन्न जिलों के उत्पाद उपलब्ध हैं। यहां भागलपुरी सिल्क, टसर सिल्क, मटका सिल्क सहित कई पारंपरिक हथकरघा उत्पाद एक ही स्थान पर खरीदे जा सकते हैं।
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