Ara: भोजपुर जिले में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत के बाद न केवल न्यायिक जांच की मांग उठी है, बल्कि जिले में पहले हुए चर्चित एनकाउंटर मामलों की भी चर्चा शुरू हो गई है। इस मामले में मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया है और घटना की जांच प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

भरत भूषण तिवारी की 17 जून 2026 को हुई मौत के बाद उनके परिजनों ने इसे फर्जी मुठभेड़ बताते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है। इस मुद्दे ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। कई सामाजिक संगठनों के साथ-साथ भोजपुरी फिल्म जगत की कुछ हस्तियां भी पीड़ित परिवार के समर्थन में सामने आई हैं।

भोजपुर में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। करीब 20 वर्ष पहले गजराजगंज ओपी क्षेत्र के नवादाबेन गांव में तीन सगे भाइयों की मौत को लेकर भी बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। 25 अगस्त 2006 को हुई उस पुलिस कार्रवाई में रामजी सिंह, लक्ष्मण सिंह और भरत सिंह की मौत हुई थी।

उस समय मृतकों के परिजनों और गांव के लोगों ने पुलिस पर फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाया था। मामला इतना बढ़ गया था कि बड़ी संख्या में ग्रामीण सड़कों पर उतर आए थे। विरोध और बढ़ते विवाद के बाद तत्कालीन टाउन डीएसपी और गजराजगंज थानाध्यक्ष को उनके पद से हटा दिया गया था। इस घटना ने उस समय पूरे जिले में व्यापक चर्चा को जन्म दिया था।

इसी तरह शाहपुर क्षेत्र में लगभग 33 वर्ष पहले हुई एक अन्य चर्चित मुठभेड़ भी अक्सर चर्चा में रहती है। मार्च 1993 में सहजौली और महरजा गांव के बीच स्थित एक इलाके में पुलिस और करिया तिवारी के बीच मुठभेड़ हुई थी। पुलिस को सूचना मिली थी कि करिया तिवारी अपने साथियों के साथ वहां छिपा हुआ है।

बताया जाता है कि पुलिस ने इलाके की घेराबंदी की थी और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक गोलीबारी हुई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस अभियान में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी शामिल थे और सैकड़ों राउंड गोलियां चली थीं। मुठभेड़ में करिया तिवारी की मौत हो गई थी, जबकि उसके तीन साथी घायल हुए थे।

हालांकि उस कार्रवाई के बाद भी पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। आरोप लगाया गया था कि जमीन विवाद से जुड़े विरोधी पक्ष के कुछ लोग भी पुलिस कार्रवाई के दौरान मौजूद थे और उन्होंने भी गोलीबारी में हिस्सा लिया। हालांकि इन आरोपों की कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी।

अब भरत भूषण तिवारी मामले के बाद पुराने विवादित एनकाउंटर फिर चर्चा में आ गए हैं। कई सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक संगठन पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि न्यायिक जांच निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से होती है, तो इससे न केवल वर्तमान मामले के तथ्य सामने आएंगे, बल्कि भविष्य में पुलिस कार्रवाई को लेकर जनता के विश्वास को भी मजबूती मिलेगी। फिलहाल भरत भूषण तिवारी मुठभेड़ मामले की जांच जारी है और पूरे जिले की नजरें जांच के निष्कर्षों पर टिकी हुई हैं।

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