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आदिवासी सभ्यता के प्राचीन साक्ष्य, हुरनाली में मिलीं मेनहिर समाधियां, आकलन करने पहुंची ASI

चतरा के इटखोरी में मिले प्रागैतिहासिक महापाषाण, आदिवासी सभ्यता के संरक्षण की पहल शुरू

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Chatra: झारखंड के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले चतरा जिले से प्राचीन सभ्यता से जुड़ा एक बेहद अहम पहलू सामने आया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रांची मंडल के विशेषज्ञ दल ने इटखोरी प्रखंड के हुरनाली गांव स्थित मेगालिथ (महापाषाणिक) स्थल का विस्तृत निरीक्षण किया। यह पुरातात्विक पड़ताल विभाग के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. करबी साहा के दिशा-निर्देश पर की गई, जिसका उद्देश्य इस स्थल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वैज्ञानिक महत्व का सटीक आकलन करना है।

विशेषज्ञ दल ने परखी ऐतिहासिक बनावट

निरीक्षण दल में रांची सर्किल के अनुभवी पुराविद डॉ. नीरज कुमार मिश्र के साथ कन्हैया झा, मोहम्मद नौशाद आलम और गुलाब सिंह शामिल रहे। विशेषज्ञों की टीम ने हुरनाली गांव के भू-भाग का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि यहां प्राचीन काल की महापाषाणिक समाधियों के सुदृढ़ अवशेष फैले हुए हैं।

मेनहिर यानी खड़े पत्थरों की समाधियां मौजूद

सर्वेक्षण के दौरान टीम ने रेखांकित किया कि इस क्षेत्र में विशालकाय ‘मेनहिर’ यानी ऊर्ध्वाधर खड़े पत्थरों से बनी समाधियां बहुतायत में मौजूद हैं। पुरातात्विक दृष्टि से इस किस्म की संरचनाएं बेहद दुर्लभ मानी जाती हैं। जानकारों के मुताबिक, खड़े पत्थरों की ये समाधियां प्राचीन काल में आदिवासियों द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक अंतिम संस्कार और स्मृति अनुष्ठानों से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। ये अवशेष बताते हैं कि हजारों साल पहले भी यह क्षेत्र एक सुव्यवस्थित और विकसित सांस्कृतिक समाज का गवाह रहा है।

आदिवासी संस्कृति की अनमोल धरोहर के संरक्षण की तैयारी

पुरातात्विक विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि हुरनाली में मौजूद ये मेगालिथ केवल पत्थर की संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि आदिवासी समुदाय के समृद्ध इतिहास, दर्शन और सामाजिक परंपराओं के जीवंत दस्तावेज हैं। समय बीतने, मानवीय गतिविधियों और मौसमी बदलावों के कारण इन ऐतिहासिक स्थलों के क्षरण का खतरा बना रहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस पुरास्थल की वैज्ञानिक फेंसिंग और विधिवत संरक्षण की दिशा में शुरुआती कदम बढ़ा दिए हैं।
इस स्थल का विधिवत संरक्षण होने से न केवल पुरातत्व शोधार्थियों को आदिवासी परंपराओं के उद्भव को समझने में मदद मिलेगी, बल्कि इटखोरी का यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहर के मानचित्र पर भी मजबूती से स्थापित होगा।
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