Tirana, Albania: यूरोपीय महाद्वीप के देश अल्बानिया के उत्तरी पहाड़ी इलाकों से इतिहास और संस्कृति से जुड़ी एक बेहद अनूठी तथा असाधारण परंपरा सामने आई है। यहाँ के कुछ रूढ़िवादी परिवारों में विशेष और कठिन परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर महिलाएं ‘बुर्नेशा’ (Burnesha) बन जाती थीं। इस ऐतिहासिक परंपरा के तहत महिलाएं अपने मूल स्त्री रूप को त्यागकर परिवार की मुख्यिआ बनती थीं और पुरुषों की तरह ही समस्त सामाजिक व पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करती थीं। अल्बानियाई भाषा में ‘बुर्नेशा’ शब्द का सीधा अर्थ ‘पुरुष’ ही माना जाता है। हालांकि, इस रुतबे को हासिल करने के बदले में उन्हें आजीवन अविवाहित रहने और कभी संतान पैदा न करने की एक बेहद कठोर शपथ लेनी पड़ती थी।

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कानून आधारित परंपरा

यह ऐतिहासिक प्रथा मुख्य रूप से ‘कनून’ नामक एक प्राचीन जनजातीय कानून पर पूरी तरह आधारित थी, जिसने सदियों तक उत्तरी अल्बानिया के ग्रामीण सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। उस मध्यकालीन दौर में यदि किसी परिवार में कोई पुरुष उत्तराधिकारी जीवित नहीं बचता था—जैसे कि सभी सगे भाई आपसी युद्ध, किसी गंभीर बीमारी या आकस्मिक दुर्घटना में मारे जाते थे, अथवा परिवार में कोई बेटा ही पैदा नहीं होता था—तो ऐसी स्थिति में संपत्ति और सम्मान को बचाने के लिए परिवार की कोई भी बेटी स्वेच्छा से ‘बुर्नेशा’ बनने का अंतिम निर्णय ले सकती थी। एक बार सार्वजनिक रूप से शपथ लेने के बाद स्थानीय समाज उसे पूर्ण रूप से पुरुष का दर्जा दे देता था।

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पुरुषों जैसे अधिकार और पाबंदियां

बुर्नेशा बनने के बाद ये महिलाएं पुरुषों जैसे पहनावे को धारण करती थीं, कई बार पुरुषों जैसा नाम भी अपना लेती थीं और समाज उन्हें पुरुष के रूप में ही पूरी मान्यता देता था। उन्हें तत्कालीन समाज में स्वतंत्र रूप से संपत्ति खरीदने, पारिवारिक पैतृक विरासत प्राप्त करने, घर की मुख्यिआ बनने, व्यावसायिक गतिविधियों में सीधे भाग लेने और सार्वजनिक जीवन में बिना किसी रोक-टोक के आने-जाने का पूरा हक मिल जाता था। उस दौर में आम महिलाओं को जो बुनियादी अधिकार उपलब्ध नहीं थे, वे सभी विशेष अधिकार बुर्नेशा को प्राप्त हो जाते थे।

हालांकि, इस प्राचीन जनजातीय कानून की सबसे कठोर शर्त आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना था। एक बार प्रतिज्ञा लेने के बाद विवाह करना या माँ बनना पूरी तरह वर्जित माना जाता था। यदि कोई महिला इस प्रतिज्ञा को बीच में तोड़ती थी, तो उसे भारी सामाजिक बहिष्कार और अपमान का सामना करना पड़ता था। इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा परिवार की संपत्ति, आत्मसम्मान और सामाजिक पहचान को सुरक्षित रखने का एक व्यावहारिक सामाजिक उपाय थी। वर्तमान में आधुनिक बदलावों और नारी सशक्तिकरण के बाद यह प्रथा दम तोड़ चुकी है और अब केवल गिनी-चुनी बुर्नेशा ही जीवित बची हैं, जिनकी आयु 70 से 80 वर्ष से अधिक हो चुकी है।

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