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Home»World»स्कूल के बाद अब कॉलेज से भी गायब होगी तिब्बती भाषा, सिर्फ चलेगी मैंडरिन
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स्कूल के बाद अब कॉलेज से भी गायब होगी तिब्बती भाषा, सिर्फ चलेगी मैंडरिन

चीन तिब्बत की मातृभाषा पर लगातार प्रहार कर रहा है। स्कूलों के बाद अब कॉलेजों से भी तिब्बती भाषा हटाई जाएगी और सिर्फ मैंडरिन को अनिवार्य किया जाएगा। क्या यह तिब्बत की संस्कृति और पहचान खत्म करने की साज़िश है?
By Samsul HaqueAugust 26, 20254 Mins Read
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World News: चीन के कब्जे वाले इलाकों में अपनी मनमानी को थोपने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के कब्जे वाले तिब्बत में तिब्बती भाषा में पढ़ाए जा रहे स्कूलों को बंद करना शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, पश्चिमी चीन के सिचुआन प्रांत के अधिकतर तिब्बती भाषा में पढ़ाने वाले निजी तिब्बती स्कूलों को बंद कर रहे हैं और छात्रों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जहां मैंडरिन भाषा में ही पढ़ाया जाता है।

चीन के संविधान में साफ लिखा है कि अल्पसंख्यक समूहों को अपनी भाषा के इस्तेमाल और उसके विकास का कानूनी अधिकार दिया गया है, लेकिन अब चीन उसी संविधान के खिलाफ जाकर तिब्बत की संस्कृति और भाषा को मिटाने में लगा है। पहले तिब्बती भाषा पढ़ाने वाले स्कूल बंद करवाए और अब कॉलेज एंट्रेंस एग्जाम में तिब्बती भाषा को बैन करने की तैयारी में है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ऑटोनोमस रीजन के ज्यादातर छात्रों के लिए नेशनल कॉलेज एंट्रेंस एग्जाम से तिब्बती भाषा को मेन सब्जेक्ट के रूप में हटाने की योजना बना रहा है। चीन की तरफ से इस बदलाव को राष्ट्रीय परीक्षा में सुधारों का हिस्सा बताया जा रहा है, लेकिन ऐसा करके चीन तिब्बत से उनकी भाषा भी जबरन छीन रहा है।सूत्रों के मुताबिक अगले साल से ऐसा लागू हो सकता है।

साल 2020 के आखिर से ही स्कूलों को बंद कराया जा रहा है। यही नहीं, स्कूलों के पाठ्यक्रम में प्राइमरी लैंग्वेज अब मैंडरिन ही कर दी गई है। तिब्बती भाषा सेकेंडरी है। यही नहीं, सर्दियों की छुट्टी में अगर कोई तिब्बती परिवार अपने बच्चों को अपनी भाषा में प्राइवेट कोचिंग भी दिलाना चाहता है तो उस पर भी रोक लगाई जा रही है। बाकायदा घर-घर जाकर चीनी प्रशासन इसकी तस्दीक भी कर रहा है। चीन अपनी संस्कृति और भाषा को जबरन लोगों पर थोपने में लगा हुआ है। जानकारी के मुताबिक, सिचुआन के दज़ाचुखा क्षेत्र में पहले कई निजी स्कूल थे जहां तिब्बती भाषा और संस्कृति सिखाई जाती थी, उन्हें बिना किसी कारण के बंद करा दिया गया।

चीनी प्रशासन का दावा है कि पाठ्यपुस्तकों और शिक्षण सामग्री के उपयोग में समानता को बढ़ावा देने के नाम पर यह कदम उठाया जा रहा है। वैसे तो चीन ने कब्जाए हुए इलाकों में अपनी भाषा का प्रसार करने के लिए सभी जगह चाहे वो रेलवे हो, बस स्टेशन हो, शॉपिंग मॉल हो या पोस्टर होर्डिंग, सभी जगह अब अंग्रेजी के अलावा मैंडरिन भाषा में सब कुछ लिखा होता है। स्थानीय भाषा को दरकिनार किया जा रहा है।

शी जिनपिंग के 2035 शिक्षा प्लान के तहत पूरे चीन में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम सामग्री में व्यापक सुधार के नाम पर चीनी विशेषताओं को जोड़ना है। उसके लिए बाकायदा तेजी से काम जारी है। इससे पहले चीन के कब्जे वाले मंगोलिया जिसे इनर मंगोलिया कहा जाता है, वहां भी स्थानीय लोगों ने चीन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया था और इसकी वजह थी कि इनर मंगोलिया ऑटोनोमस रीजन में चीन जबरन अपनी नीतियों को थोप रहा है। चीन वहां की मूल भाषा को बदलकर चीनी भाषा को प्राथमिक भाषा के तौर पर लागू कर रहा है। मैंडरिन भाषा को कंपलसरी और मंगोलियन भाषा को दूसरे दर्जे में रखा गया है। तीन ऐसे इलाके हैं जहां चीन की बर्बरता सबसे ज्यादा है, जिनमें शिंजियांग, तिब्बत और इनर मंगोलिया शामिल हैं।

सैन्य स्तर के साथ-साथ तिब्बत के उन गांव जो कि एलएसी के पास हैं, उनका भविष्य में कैसे सामरिक तौर पर इस्तेमाल कर सके, इसको भी प्राथमिकता पर रखा है। चीन पहले ही वहां की शिक्षा पद्धति को बदल चुका है। मैंडरिन भाषा तो प्रथम भाषा के तौर पर सभी स्कूलों में लागू किया गया है। अब चीनी सेना की नजर एलएसी के करीब के गांव में तिब्बती परिवारों के स्कूल जाने वाले बच्चों पर है। खुफिया रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि चीनी सेना ने नागरी प्रांत के ताशिगॉंग, जिव लंगमार, रवांग, रुडोक, डेमचौक के एलएसी के करीब रहने वाले 6 से 9 साल के सैंकड़ों बच्चों को बोर्डिंग में भेजा जा रहा है। इन बच्चों में लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं।

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