Patna: कभी घर की चारदीवारी और चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली बिहार की महिलाएं आज गांव की सरकार की असली ‘बॉस’ बन चुकी हैं। साल 2006-07 में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को मिला 50 फीसदी आरक्षण आज सूबे की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल रहा है। ठेठ ग्रामीण जमीन पर उतरीं इन महिला मुखियाओं, वार्ड सदस्यों और जीविका दीदियों ने यह साबित कर दिया है कि मौका मिले तो वे सिर्फ चूल्हा-चौका ही नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम भी शानदार तरीके से चला सकती हैं।
दुर्गा पूजा के इस पावन अवसर पर इन महिला जनप्रतिनिधियों को मां दुर्गा के स्वरूपों की तरह गांवों में अन्याय, गरीबी और रूढ़िवादिता का खात्मा करते साफ देखा जा सकता है। आइए, जानते हैं बिहार के अलग-अलग कोनों से आ रही ग्राउंड रिपोर्ट, जहां महिला नेतृत्व ने विकास की नई इबारत लिख दी है।
1. पैगम्बरपुर पंचायत (मुजफ्फरपुर): युवा मुखिया का ‘टीबी मुक्त’ महाअभियान

मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड की पैगम्बरपुर पंचायत में कदम रखते ही विकास की एक अलग ही बयार बहती दिखती है। यहां की युवा मुखिया प्रियंका कुमारी ने ठान लिया था कि उनकी पंचायत का कोई भी शख्स बीमारी की वजह से दम नहीं तोड़ेगा।
ग्राउंड एक्शन: मुखिया ने पंचायत को टीबी मुक्त बनाने का बीड़ा उठाया। हर पंचायत बैठक में टीबी के खात्मे पर सबसे पहले चर्चा होती है।
मानवीय पहल: प्रियंका ने खुद आगे बढ़कर कई टीबी मरीजों को गोद लिया और उनके घर पौष्टिक आहार के पैकेट पहुंचाए।
असर: इस पहल से बीमारी से जुड़ा सामाजिक कलंक भी मिटा और मरीजों के इलाज पूरा करने की रफ्तार तेजी से बढ़ी। आज यह पंचायत पूरे इलाके में ‘मॉडल स्वस्थ पंचायत’ बन चुकी है।
2. तेल्हारा पंचायत (नालंदा): जहां हर घर से आ रही कमाई की खनक

नालंदा जिले की तेल्हारा पंचायत अब गरीबी को मुंह चिढ़ा रही है। यहां की मुखिया प्रतिमा देवी ने अपनी दूरदर्शिता से गांवों की आर्थिक सेहत ही सुधार दी है।
कारोबार का जाल: स्थानीय उद्यमिता और जीविका समूहों की ताकत से यहां आज करीब 150 परिवार बकरी पालन और 450 से ज्यादा लोग दूध के बिजनेस से जुड़े हैं। इसके अलावा सूअर, मुर्गी और मधुमक्खी पालन का काम भी जोर-शोर से चल रहा है।
लोकल टू ग्लोबल: महिलाओं ने मिलकर पैंट-टीशर्ट, लेदर जैकेट, एल्युमिनियम के बर्तन, पेपर प्लेट और मशरूम उत्पादन का काम शुरू किया है। अब तेल्हारा के इन उत्पादों की गूंज जहानाबाद, पटना और नालंदा तक के बाजारों में सुनाई दे रही है।
3. बाघा खाल पंचायत (मुजफ्फरपुर): नौनिहालों के भविष्य की नई पाठशाला
मुजफ्फरपुर के गायघाट प्रखंड की बाघा खाल पंचायत की मुखिया विभा कुमारी ने बच्चों की शिक्षा और अधिकारों को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है।
जमीन पर बदलाव: स्कूलों में ‘बाल संसद’ और ‘ग्रीन क्लब’ की स्थापना कराई गई ताकि बच्चे अपने अधिकारों के प्रति बचपन से ही जागरूक हो सकें।
चौपाल और नुक्कड़ नाटक: पंचायत में 30 से ज्यादा रात्रि चौपाल और नुक्कड़ नाटक कराए गए, जिससे बाल विवाह और कुप्रथाओं पर लगाम लगी।
नतीजा: जिन 17 बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी, उन्हें वापस स्कूल की चौखट पर खींच लाया गया।
4. लदहो पंचायत (दरभंगा): अशिक्षित होने के बावजूद लिख दिया नया इतिहास

दरभंगा जिले के बिरौल प्रखंड की वार्ड नंबर 03 की 59 वर्षीय वार्ड सदस्य फूल कुमारी देवी ने यह साबित कर दिया कि नेता बनने के लिए कागजी डिग्रियां नहीं, बल्कि इरादों का मजबूत होना जरूरी है।
सुरक्षा कवच: फूल कुमारी ने अपने वार्ड के अंधेरे और सुनसान रास्तों को चिन्हित किया और थाने से बात कर वहां पुलिस गश्त पक्की कराई। इससे महिलाओं और किशोरियों का डर छूमंतर हो गया।
सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन: स्कूल में बेटियों की परेशानी भांपते हुए महिला जनप्रतिनिधियों ने मुखिया कविता देवी को आवेदन दिया। नतीजा यह हुआ कि मिडिल स्कूल में पैड वेंडिंग मशीन और सुरक्षित निस्तारण यूनिट लग गई। इस मुहिम में मंजू देवी, विभा देवी, जैतून खातून और बेबी कुमारी जैसी महिलाओं ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।
5. उसरी पंचायत (मुजफ्फरपुर): झिझक से लेकर स्ट्रीट लाइट ठीक कराने तक का सफर

कभी अपने घर की देहरी लांघने में कांपने वाली उसरी पंचायत के वार्ड नंबर 8 की श्यामपुल देवी आज पूरे इलाके के लिए प्रेरणा हैं।
आत्मविश्वास की उड़ान: पति के सहयोग से कामकाज की बारीकियां सीखीं और आज हालत यह है कि वे वार्ड में खराब स्ट्रीट लाइटों की मरम्मत, बाढ़ के वक्त नाव का इंतजाम और जरूरी दवाइयां घर-घर पहुंचाने का जिम्मा अकेले उठा रही हैं। जनता के अटूट भरोसे ने उन्हें लगातार दूसरी बार वार्ड जिताया है, और अब उनके वार्ड में पक्की सड़कों का जाल भी बिछने लगा है।
जीविका दीदियों ने बचाई बाल-सड़क पर जा रही दो बेटियों की जिंदगी
मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड के पोखरेरा गांव में जब 15 साल की नंदनी कुमारी की जबरन शादी की तैयारी चल रही थी, तब वार्ड सदस्य मीना देवी फरिश्ता बनकर पहुंचीं। उन्होंने मां को समझाया कि “बेटी का हाथ पीले करने से पहले इसे पढ़ा-लिखाकर पैरों पर खड़ा कीजिए।” मां की आंखें खुलीं और शादी का फैसला तुरंत टल गया।
कुछ ऐसा ही वाकया बहिलवारा रूपनाथ उत्तरी गांव में हुआ, जहां गरीबी की मारी 15 साल की सोनम कुमारी पर भी ब्याह का दबाव था। वार्ड सदस्य फूलकुमारी देवी और जीविका दीदियों ने पंचायत बैठाकर परिवार को ऐसा समझाया कि सोनम के हाथ में किताब थमाकर दोबारा स्कूल भेज दिया गया। आज ये दोनों बेटियां बेखौफ होकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही हैं।




