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तालझारी दुर्गा मंदिर: 327 साल पुरानी परंपरा, 22 गांवों की कुलदेवी और अटूट जन-आस्था

मराठा विरासत और तांत्रिक अनुष्ठान, पिंडी रूप में पूजी जाती हैं भगवती, महानवमी पर उमड़ता है जनसैलाब

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Devghar: झारखंड की धर्मनगरी देवघर केवल बाबा बैद्यनाथ धाम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके ग्रामीण अंचलों में भी सैकड़ों वर्षों की पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहरें जीवंत हैं। सारठ प्रखंड के कुकराहा पंचायत स्थित तालझारी गांव का मां दुर्गा मंदिर ऐसा ही एक अनूठा केंद्र है, जहां पिछले 327 वर्षों से मां भगवती की आराधना बिना रुके निरंतर चली आ रही है। यहां मां की किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि उनके दिव्य पिंडी स्वरूप की तांत्रिक विधि से उपासना की जाती है। यह मंदिर आज भी 22 मौजा के गांवों की साझी कुलदेवी और धार्मिक एकता का जीवंत प्रतीक है।

मराठा साम्राज्य से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

नगरा स्टेट परिवार के वंशज संजीव कुमार सिंह इस परंपरा की ऐतिहासिक जड़ों पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि उनके पूर्वज 17वीं सदी में महाराष्ट्र में निवास करते थे। मराठा सेना और सरदारों के साथ वे पहले कोलकाता पहुंचे और बाद में नवाब सिराजुद्दौला के शासनकाल के दौरान झारखंड के नगरा क्षेत्र में आकर बस गए। परिवार की मान्यता है कि उनके पूर्वज को मां भगवती ने स्वप्न में दर्शन देकर पिंडी रूप में प्रतिष्ठित होने का आदेश दिया था। इसके बाद अजय नदी के पावन तट पर मां की पिंडी स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की गई, जो आज साढ़े तीन शताब्दियों के बाद भी उसी निष्ठा से चल रही है।

वर्ष 2016 में बना महाराष्ट्र शैली का भव्य मंदिर

शुरुआती दौर में साधारण स्थल पर पूजी जाने वाली मां भगवती के लिए वर्ष 2016 में एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। नगरा स्टेट के वंशजों और स्थानीय ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से महाराष्ट्र से विशेष कारीगरों को बुलाकर मंदिर को नक्काशीदार और आकर्षक रूप दिया गया। मंदिर की वास्तुकला में पारंपरिक और आधुनिक शिल्प का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

अलौकिक अनुभव और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास

मंदिर के मुख्य पुजारी धीरेंद्र तिवारी और विष्णुकांत तिवारी बताते हैं कि तालझारी वाली मां के प्रति भक्तों की निष्ठा अगाध है। स्थानीय ग्रामीणों और पुजारियों का कहना है कि आज भी कई बार मध्यरात्रि में मंदिर के पट स्वतः खुलने और गर्भग्रह के आसपास देवी के नूपुरों (पायल के घुंघरुओं) की दिव्य ध्वनि सुनाई देने जैसे अलौकिक अनुभव होते हैं। भक्तों की दृढ़ मान्यता है कि इस पावन धाम में जो भी भक्त सच्चे हृदय से मनोकामना लेकर आता है, मां उसे कभी निराश नहीं लौटातीं।

22 गांवों की कुलदेवी और सामाजिक समरसता की मिसाल

तालझारी मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल है। तालझारी, नगरा, नोनियाटांड़, शहरजोरी, मनिगढ़ी, नकटी, महापुर, कर्मा सहित कुल 22 गांवों के लोग मां दुर्गा को अपनी कुलदेवी मानते हैं। महानवमी के दिन यहां ऐतिहासिक मेला लगता है, जिसमें तांत्रिक अनुष्ठानों के साथ सैकड़ों बकरों और दर्जनों भैंसों की पारंपरिक बलि अर्पित की जाती है। इस महापर्व में आसपास के दर्जनों आदिवासी परिवार भी अपनी पारंपरिक रीतियों के साथ शामिल होते हैं और अपनी कुलदेवी का पूजन करते हैं। पीढ़ियों से चला आ रहा यह संगम तालझारी मंदिर को झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान बनाता है।
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