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जब बाबासाहेब आंबेडकर ने 5 लाख अनुयायियों संग अपनाया बौद्ध धम्म

जानिए क्यों डॉ. आंबेडकर ने दीक्षाभूमि से शुरू की थी नवयान बौद्ध आंदोलन की लहर

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Ranchi: 14 अक्टूबर 1956 की वह सुबह भारत के सामाजिक इतिहास की सबसे क्रांतिकारी तारीखों में दर्ज है। महाराष्ट्र के नागपुर शहर में एक ऐसा जनसैलाब उमड़ा था, जिसने सदियों पुरानी सामाजिक रूढ़ियों और जातिगत गैर-बराबरी की दीवारों को हिलाकर रख दिया। भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार, प्रखर समाज सुधारक और स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने अपने लगभग 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। यह केवल एक धार्मिक रूपांतरण नहीं था, बल्कि करोड़ों शोषितों, वंचितों और अस्पृश्यता का दंश झेल रहे इंसानों के आत्मसम्मान, गरिमा और मानवीय अधिकारों की घोषणा थी।

21 साल पुराना संकल्प, मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं

इस महापरिवर्तन की नींव 1956 में नहीं, बल्कि उससे ठीक 21 साल पहले 1935 में नासिक के पास स्थित ‘येवला’ सम्मेलन में पड़ी थी। हिंदू समाज में व्याप्त वर्ण-व्यवस्था, छुआछूत और जातीय उत्पीड़न से दशकों तक संघर्ष करने और उसमें सुधार के तमाम प्रयासों के विफल होने के बाद, बाबासाहेब ने भारी मन से एक कड़ा फैसला लिया था।
उन्होंने येवला में स्पष्ट शब्दों में कहा था, “दुर्भाग्य से मैं एक अछूत हिंदू के रूप में पैदा हुआ, यह मेरे बस में नहीं था, लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं, यह मेरे वश में है।”
इस घोषणा के बाद बाबासाहेब ने दुनिया के प्रमुख धर्मों इस्लाम, ईसाई, सिख और बौद्ध का वर्षों तक गहन तुलनात्मक, दार्शनिक और ऐतिहासिक अध्ययन किया। वे किसी ऐसे धर्म की तलाश में थे जो केवल पूजा-पद्धति न होकर जीवन जीने की ऐसी संहिता दे, जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के सार्वभौमिक सिद्धांत सर्वोपरि हों।

नागपुर और विजयादशमी का चयन क्यों?

धम्म दीक्षा के लिए नागपुर शहर और विजयादशमी का दिन चुनना कोई संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरा ऐतिहासिक संदर्भ था। बाबासाहेब के अनुसार, नागपुर ऐतिहासिक रूप से ‘नाग’ लोगों की भूमि थी, जिन्होंने प्राचीन काल में बुद्ध के विचारों को सहेजने और उसका प्रसार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
विजयादशमी को ‘अशोक विजयादशमी’ के रूप में भी जाना जाता है। इसी दिन सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की भयावह हिंसा के बाद शस्त्र त्यागकर तथागत बुद्ध के अहिंसा, करुणा और शांति के मार्ग को अपनाया था। ऐसे में एक आधुनिक समाज के निर्माण के लिए नागपुर की यह भूमि सबसे उपयुक्त मानी गई, जिसे आज पूरी दुनिया ‘दीक्षाभूमि’ के नाम से जानती है।

14 अक्टूबर 1956 का वह भावुक और ऐतिहासिक पल

दीक्षा का दिन जैसे-जैसे पास आया, पूरे देश विशेषकर महाराष्ट्र से लाखों लोग नागपुर पहुंचने लगे। लोग पैदल, बैलगाड़ियों और ट्रेनों से अपनी गठरी बांधे, फटेहाल लेकिन आंखों में आत्मसम्मान की चमक लिए नागपुर की ओर खिंचे चले आए। पूरा मैदान सफेद परिधानों में सजे स्त्री-पुरुषों से भरा हुआ था।
समारोह में सबसे वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु महास्थवीर चंद्रमणि ने पारंपरिक बौद्ध विधि से बाबासाहेब और उनकी पत्नी डॉ. सविता आंबेडकर को ‘त्रिशरण’ और ‘पंचशील’ की दीक्षा दी। बौद्ध धर्म अपनाने के तुरंत बाद, बाबासाहेब मंच पर आए और अपने सामने बैठे लाखों अनुयायियों को स्वयं दीक्षा दिलाई।
एक साथ 5 लाख से अधिक हाथों का उठना और ‘बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि’ का समवेत स्वर में गूंजना ऐसा दृश्य था, जिसने वैश्विक स्तर पर इतिहास रच दिया। यह आधुनिक विश्व के इतिहास में शांतिपूर्ण ढंग से हुआ सबसे बड़ा सामूहिक धर्म परिवर्तन था।

22 प्रतिज्ञाएं: नवयान का वैचारिक घोषणापत्र

डॉ. आंबेडकर भली-भांति जानते थे कि केवल नाम बदलने से सामाजिक मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलाईं। इन प्रतिज्ञाओं का उद्देश्य पुरानी जातिगत मान्यताओं, अंधविश्वासों, सामाजिक भेदभाव और अमानवीय परंपराओं का पूरी तरह त्याग करना था।
इन प्रतिज्ञाओं में स्पष्ट किया गया कि वे किसी भी ऐसे कर्मकांड या धारणा में विश्वास नहीं करेंगे जो मनुष्य को जन्म के आधार पर छोटा या बड़ा मानती हो। उन्होंने बुद्ध के बताए अष्टांगिक मार्ग, प्रज्ञा, शील और करुणा के मूल्यों को अपनाने का संकल्प दिलाया। डॉ. आंबेडकर द्वारा पुनर्जीवित इस बौद्ध धारा को आगे चलकर ‘नवयान’ कहा गया, जिसमें सामाजिक न्याय, तर्कसंगतता और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखा गया।

सामाजिक क्रांति का स्थायी प्रभाव

दीक्षा के ठीक सात सप्ताह बाद, 6 दिसंबर 1956 को बाबासाहेब का महापरिनिर्वाण हो गया। लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसा आंदोलन छोड़ गए, जिसने भारत के दबे-कुचले तबके को सिर उठाकर जीने की नई चेतना दी। नागपुर की दीक्षा ने शोषित वर्ग से हीनभावना को मिटाकर उन्हें स्वाभिमान, शिक्षा और अधिकार के प्रति जागरूक बनाया।
आज भी हर वर्ष अशोक विजयादशमी पर नागपुर की दीक्षाभूमि में लाखों लोग जुटते हैं और उस ऐतिहासिक दिन को याद करते हैं, जब कलम और विचार के दम पर एक महापुरुष ने करोड़ों इंसानों को एक नया जीवन और आत्मसम्मान का आकाश दिया था।
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