New Delhi: दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक प्रस्तावित प्रदर्शन से ठीक पहले मशहूर यूट्यूबर ध्रुव राठी को गुरुग्राम में हिरासत में लिए जाने के बाद देश में एक बड़ा कानूनी और संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। हालांकि, उन्हें देर रात रिहा कर दिया गया, लेकिन दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जंतर-मंतर पर दोबारा विरोध दर्ज कराने की कोशिश की गई, तो सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस घटनाक्रम ने एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का संविधान और कानूनी ढांचा विदेशी नागरिकों को देश के राजनीतिक या सामाजिक आंदोलनों में भाग लेने की अनुमति देता है।
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राजनीतिक भागीदारी और पिछली गतिविधियां
यह विवाद तब और गहरा गया जब ध्रुव राठी की हालिया गतिविधियों को लेकर सवाल उठाए गए। वे 8 अक्टूबर को बेंगलुरु में हुए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) विरोधी प्रदर्शन में शामिल हुए थे। इसके बाद, बेंगलुरु के पूर्व पुलिस आयुक्त और भाजपा नेता भास्कर राव ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर राठी की नागरिकता, वीजा नियमों, पासपोर्ट और इमिग्रेशन स्थिति की गहन जांच की मांग की थी। इस पूरे घटनाक्रम ने विदेशी नागरिकों की भारतीय राजनीतिक मंचों पर भागीदारी की वैधता को लेकर बहस छेड़ दी है।
संवैधानिक प्रावधान और नागरिकों-विदेशियों के अधिकार
भारतीय संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों के तहत देश के नागरिकों और विदेशी नागरिकों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है:
– अनुच्छेद 19: संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) भारतीय नागरिकों को विचार व्यक्त करने तथा भाषण की स्वतंत्रता प्रदान करता है, वहीं अनुच्छेद 19(1)(बी) शांतिपूर्ण ढंग से और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का मौलिक अधिकार देता है। ये दोनों संवैधानिक सुरक्षाएं विशेष रूप से भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित हैं। इसका अर्थ है कि केवल भारत की सीमा के भीतर मौजूद होने मात्र से किसी विदेशी नागरिक को भारतीय नागरिकों के समान राजनीतिक विरोध या प्रदर्शन करने का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता।
– अनुच्छेद 14 और 21: मौलिक अधिकारों में यह सीमा होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि विदेशी नागरिक भारतीय कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 भारत के क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को कानून के सामने समानता और समान कानूनी सुरक्षा का भरोसा देता है। इसी तरह, अनुच्छेद 21 देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
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विदेशी नागरिक भी इन संवैधानिक गारंटियों के हकदार हैं, लेकिन उनके अधिकारों का दायरा देश में उनकी मौजूदगी से जुड़े प्रशासनिक और वीजा नियमों के अधीन ही तय होता है। यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि विदेश में पैदा होने मात्र से कोई व्यक्ति कानूनन विदेशी नहीं रहता, यदि उसने भारत की नागरिकता प्राप्त कर ली हो। भारतीय नागरिक बन चुके व्यक्ति के अधिकार, वीजा शर्तों से बंधे विदेशी नागरिक की तुलना में पूरी तरह अलग होते हैं।





