Patna: मौसम के अप्रत्याशित मिजाज, बेमौसम बारिश, अनियमित सूखा और वायु गुणवत्ता में गिरावट जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने खेती के तौर-तरीकों को जलवायु के अनुकूल ढालने की रणनीति बनाई है। पटना स्थित दशरथ मांझी श्रम एवं नियोजन अध्ययन संस्थान में संपन्न हुए दो दिवसीय ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन क्लाइमेट चेंज क्रॉसरोड्स’ के तकनीकी सत्र में देशभर से जुटे कृषि विशेषज्ञों ने इस पर गहन मंथन किया। इस सत्र में फसल विविधीकरण, कीट प्रबंधन, मिट्टी की नमी, वायु गुणवत्ता और स्मार्ट फसल प्रतिरूपण (क्रॉप मॉडलिंग) को भारतीय कृषि के भविष्य के लिए अनिवार्य बताया गया।
मौसम के जोखिम से बचने को किसानों ने चुनी वैकल्पिक फसलें
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि चालू वर्ष में मानसून की शुरुआती बेरुखी के बावजूद जागरूक किसानों ने अपनी फसल योजना में व्यावहारिक बदलाव किए। ऊपरी असिंचित इलाकों में पानी की अधिक खपत वाली धान की खेती के बदले किसानों ने उड़द और मोटे अनाजों (मिलेट्स) जैसी कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसानों को पंचायत और ब्लॉक स्तर पर स्थानीय मौसम का सटीक पूर्वानुमान समय पर उपलब्ध कराया जाए, तो वे जोखिम कम करने वाली फसलों का चयन कर बड़े आर्थिक नुकसान से बच सकते हैं।
केवल बारिश-तापमान नहीं, हवा और मिट्टी भी प्रभावित करते हैं उपज
तकनीकी सत्र के दौरान यह तथ्य प्रमुखता से उभरा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को केवल तापमान वृद्धि या बारिश के घटते-बढ़ते आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। हवा में बढ़ता प्रदूषण, धुंध और कोहरा फसलों की प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) प्रक्रिया को बाधित करते हैं, जिससे उत्पादन गिरता है। वहीं, मिट्टी की नमी न केवल पौधों की जल आवश्यकता को नियंत्रित करती है, बल्कि जड़ों के तापमान और आवश्यक जैविक गतिविधियों को भी बनाए रखती है। ऐसे में इन सभी घटकों की संयुक्त निगरानी अनिवार्य हो गई है।
2027 की जायद फसल से शुरू होगा दो वर्षीय एक्शन रिसर्च
वैज्ञानिकों ने इन सभी पारिस्थितिक पहलुओं को शामिल करते हुए अगले दो वर्षों के लिए एक एकीकृत एक्शन रिसर्च की कार्ययोजना तैयार की है। इस विशेष अध्ययन की शुरुआत संभावित रूप से वर्ष 2027 की जायद फसल (रबी और खरीफ के बीच की अवधि) से होगी। इस शोध का सबसे अहम पहलू यह है कि इसमें किसानों को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर डेटा जुटाने वाले सक्रिय भागीदार के रूप में शामिल किया जाएगा। यह अध्ययन भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU सबौर) और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा) के संयुक्त समन्वय से सीधे खेतों पर संचालित किया जाएगा।



