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सायनाइड-पारे के बिना निकलेगा सोना, जर्मनी के वैज्ञानिकों की बड़ी खोज

Berlin, (Germany) — जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे अनूठे सूक्ष्मजीव की कार्यप्रणाली का गहन अध्ययन किया है, जो विषैले धातु यौगिकों को शुद्ध सोने के सूक्ष्म कणों में बदलने की अद्भुत क्षमता रखता है। यह बैक्टीरिया दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए भारी आकर्षण

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Berlin, (Germany) — जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे अनूठे सूक्ष्मजीव की कार्यप्रणाली का गहन अध्ययन किया है, जो विषैले धातु यौगिकों को शुद्ध सोने के सूक्ष्म कणों में बदलने की अद्भुत क्षमता रखता है। यह बैक्टीरिया दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए भारी आकर्षण का केंद्र बन गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज भविष्य में पर्यावरण-अनुकूल खनन तकनीक (इको-फ्रेंडली माइनिंग) विकसित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह पूरी तरह स्पष्ट करते हैं कि यह बैक्टीरिया सामान्य अर्थों में खुद से सोना ‘बनाता’ नहीं है, बल्कि मिट्टी या पानी में पहले से मौजूद घुले हुए स्वर्ण यौगिकों को रासायनिक रूप से परिवर्तित कर उन्हें ठोस सोने के कणों के रूप में जमा कर देता है।

यह महत्वपूर्ण अध्ययन जर्मनी की मार्टिन लूथर विश्वविद्यालय और टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है। इस पूरे शोध का मुख्य केंद्र ‘क्यूप्रियाविडस मेटालिड्यूरान्स’ (Cupriavidus metallidurans) नामक एक विशेष बैक्टीरिया है, जो घातक भारी धातुओं से भरपूर और अत्यधिक विषैले वातावरण में भी आसानी से जीवित रह सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह सूक्ष्मजीव तांबा और सोने जैसे धातु यौगिकों की अधिक मात्रा वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से सक्रिय रहता है।

एंजाइमों की मदद से बनता है ठोस सोना

शोधकर्ताओं के मुताबिक, जब यह विशिष्ट बैक्टीरिया विषैले स्वर्ण यौगिकों के सीधे संपर्क में आता है, तो अपने भीतर मौजूद विशेष एंजाइमों की सहायता से उन्हें कम विषैला बनाने की प्रक्रिया शुरू करता है। इस आत्मरक्षात्मक जैविक प्रक्रिया के दौरान ही सोने के अत्यंत सूक्ष्म कण बनने लगते हैं। समय के साथ ये नैनो आकार के कण आपस में एक-दूसरे से जुड़कर बड़े कणों का रूप ले लेते हैं। वैज्ञानिकों का दृढ़ता से मानना है कि प्राकृतिक वातावरण में सोने के चक्र (गोल्ड साइकिल) को निरंतर बनाए रखने में यह जैविक प्रक्रिया बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सायनाइड और पारे के प्रदूषण से मिलेगी मुक्ति

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में पारंपरिक रूप से सोना निकालने के लिए खनन उद्योग में सायनाइड और पारे (मरकरी) जैसे बेहद खतरनाक रसायनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है, जो पर्यावरण, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। यदि इस बैक्टीरिया की कुदरती कार्यप्रणाली का औद्योगिक स्तर पर सफल और सुरक्षित उपयोग किया जा सके, तो कम गुणवत्ता वाले अयस्कों (लो-ग्रेड ओर्स) से भी अपेक्षाकृत सुरक्षित और पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल तरीके से बहुमूल्य सोना आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले यह बैक्टीरिया आसपास मौजूद घुले हुए विषैले स्वर्ण आयनों को अपने शरीर के भीतर ग्रहण करता है। इसके बाद, इसके शरीर के विशेष एंजाइम इन आयनों को कम विषैले रूप में परिवर्तित करते हैं, जिससे सोने के नैनो कण अवक्षेपित होते हैं। अंत में, यही बारीक कण धीरे-धीरे एकत्र होकर ठोस स्वर्ण कणों का भौतिक रूप ले लेते हैं। शोधकर्ता अब इस अद्भुत सूक्ष्मजीव के उपयोग को आधुनिक ‘बायोमाइनिंग’ (Biomining) तकनीक में शामिल करने की संभावनाओं पर तेजी से काम कर रहे हैं।

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