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New Delhi: देश में इस वर्ष मानसून की शुरुआत उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं रही है। केरल में दक्षिण-पश्चिम मानसून समय के आसपास पहुंचने के बावजूद कई राज्यों में शुरुआती बारिश सामान्य से कम दर्ज की गई है। इसी बीच मौसम वैज्ञानिकों ने अल-नीनो के बढ़ते प्रभाव को लेकर चेतावनी जारी की है। उनका मानना है कि जुलाई से नवंबर 2026 के बीच भारत को मौसम संबंधी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसका असर कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
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मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जून में अल-नीनो का प्रभाव अपेक्षाकृत कमजोर रह सकता है, लेकिन जुलाई और अगस्त में इसके मध्यम स्तर तक पहुंचने तथा सितंबर तक और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। प्रमुख मौसम एजेंसियों का अनुमान है कि जुलाई-अगस्त तक अल-नीनो के पूरी तरह विकसित होने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत तक हो सकती है। इतिहास भी बताता है कि अधिकांश अल-नीनो वर्षों में भारत को सामान्य से कम वर्षा का सामना करना पड़ा है।
जून 2026 के शुरुआती सप्ताहों में देश के कई हिस्सों में बारिश का स्तर औसत से नीचे रहा है। महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्यों में वर्षा में 70 से 80 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई, जबकि मध्य भारत और उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में भी बारिश सामान्य से कम रही। मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार जून महीने का कुल वर्षा आंकड़ा भी सामान्य से नीचे रह सकता है।
कमजोर और विलंबित मानसून का सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ रहा है। किसान समय पर बुवाई नहीं कर पा रहे हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अल-नीनो का वास्तविक प्रभाव जुलाई से सितंबर के बीच दिखाई देगा, जब मानसून अपने चरम पर होता है। यदि इस दौरान वर्षा में कमी आती है तो जलाशयों में पानी का स्तर घट सकता है, नदियों के प्रवाह पर असर पड़ सकता है और भूजल संकट और गहरा सकता है।
भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। खरीफ सीजन में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी प्रमुख फसलों की खेती होती है। पर्याप्त बारिश नहीं होने की स्थिति में इन फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि वर्षा सामान्य स्तर से काफी कम रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिल सकती है, जिससे खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती का हिस्सा काफी बड़ा है। सिंचाई सुविधाओं से वंचित छोटे और सीमांत किसानों पर इसका असर अधिक पड़ सकता है। इसके साथ ही चारे की कमी के कारण पशुपालन क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है।
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कम वर्षा का प्रभाव केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। जल संकट पहले से झेल रहे कई शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की समस्या और गंभीर हो सकती है। उद्योगों तथा सिंचाई परियोजनाओं पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा जलविद्युत परियोजनाओं में पानी की कमी के कारण बिजली उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अल-नीनो के प्रभाव से तापमान में और वृद्धि हो सकती है। ऐसे में देश के कई हिस्सों में गर्मी का प्रकोप लंबे समय तक बना रह सकता है। आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति पर सरकार, कृषि क्षेत्र और जल प्रबंधन एजेंसियों की विशेष नजर बनी रहेगी।

