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डिप्रेशन को दी मात: केरल की बुजुर्ग महिलाएं अब बनीं डांसर और पॉडकास्टर!

Thiruvananthapuram, (Kerala): जीवन के अंतिम पड़ाव में जहां अक्सर लोग अकेलेपन और बीमारियों से हार मान लेते हैं, वहीं केरल के अलाप्पुझा नॉर्थ की कुछ बुजुर्ग महिलाओं ने एक नई मिसाल पेश की है। कभी डिप्रेशन और खालीपन की शिकार रहीं ये महिलाएं अब डांसर,

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Thiruvananthapuram, (Kerala): जीवन के अंतिम पड़ाव में जहां अक्सर लोग अकेलेपन और बीमारियों से हार मान लेते हैं, वहीं केरल के अलाप्पुझा नॉर्थ की कुछ बुजुर्ग महिलाओं ने एक नई मिसाल पेश की है। कभी डिप्रेशन और खालीपन की शिकार रहीं ये महिलाएं अब डांसर, सिंगर और पॉडकास्टर बन चुकी हैं। हैरानी की बात यह है कि अपने शौक को जीने की इस ललक ने उनकी डिप्रेशन की भारी-भरकम दवाओं को भी बंद करवा दिया है।

‘अनपेड हाउसमेड’ की पहचान से मिला छुटकारा

इन महिलाओं का कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी घर बनाने, बच्चों की परवरिश और पति की देखभाल में “अनपेड हाउसमेड” (बिना वेतन वाली नौकरानी) बनकर गुजार दी। रिटायरमेंट के बाद जब खालीपन ने घेरा, तो वे डिप्रेशन का शिकार होने लगीं। लेकिन एक स्थानीय संस्था के साथ जुड़ने के बाद उनकी दुनिया बदल गई। अब वे अपनी फाइलों और घरेलू जिम्मेदारियों से बाहर निकलकर अपने अंदर के कलाकार और लेखक को पहचान रही हैं।

सोलो ट्रेवलिंग से लेकर पॉडकास्ट तक का सफर

इस ग्रुप की महिलाएं अब केवल घर तक सीमित नहीं हैं। इनमें से कोई सोलो ट्रेवलर बनकर दुनिया देख रही है, तो कोई पॉडकास्ट के जरिए अपने अनुभव साझा कर रही है। ग्रुप की एक सदस्य ने बताया, “हम जब भी मिलते हैं, अपने फ्यूचर प्लान शेयर करते हैं। हम एक-दूसरे को राय देते हैं क्योंकि हमारा गुजरा हुआ कल एक जैसा ही था। अब हमें सुपरवुमन होने का अहसास होता है।”

आंकड़ों में महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य

भारत में महिलाओं में डिप्रेशन की दर पुरुषों के मुकाबले काफी अधिक है। एक रिपोर्ट के अनुसार:

  • 50 साल से अधिक उम्र: 21% से ज्यादा महिलाएं डिप्रेशन से जूझ रही हैं।

  • कामकाजी महिलाएं: लगभग 17-23% कामकाजी महिलाएं गंभीर डिप्रेशन का शिकार हैं।

सामाजिक बुराइयों के खिलाफ बुलंद की आवाज

यह ग्रुप न केवल महिलाओं को मानसिक रूप से मजबूत बना रहा है, बल्कि उन्हें सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी प्रेरित कर रहा है। संस्था की कोऑर्डिनेटर का लक्ष्य है कि ये महिलाएं अपने फैसले खुद ले सकें और समाज में एक सक्रिय भूमिका निभाएं। इन महिलाओं की यह ‘नई पारी’ साबित करती है कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए उम्र कभी भी बाधा नहीं बनती।

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