Cairo: आधुनिक विज्ञान और पुरातत्व की दुनिया से एक बेहद हैरान करने वाला और ऐतिहासिक खुलासा सामने आया है। मिस्र के एक प्राचीन मकबरे की खुदाई के दौरान शोधकर्ताओं को लगभग 3,000 वर्ष पुराना शहद (3,000-Year-Old Honey) मिला है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि हजारों साल का लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी यह शहद आज तक पूरी तरह सुरक्षित और खाने योग्य (Edible) स्थिति में पाया गया है।

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इस असाधारण और ऐतिहासिक खोज (Historical Discovery) की कड़ियाँ साल 1922 से जुड़ी हैं, जब प्रसिद्ध ब्रिटिश पुरातत्वविद् हॉवर्ड कार्टर (Howard Carter) और उनकी टीम ने मिस्र के सबसे चर्चित शासक राजा तूतनखामुन के मकबरे (Tomb of Tutankhamun) को खोजा था। उस दौरान हुई गहरी खुदाई में टीम को संगमरमर और मिट्टी के कई प्राचीन जार मिले थे, जिनके भीतर गाढ़े अंबर रंग का शहद भरा हुआ था। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए आधुनिक लैब परीक्षणों (Lab Tests) में साबित हुआ है कि लगभग 1323 ईसा पूर्व का होने के बावजूद इस शहद की मिठास और शुद्धता आज भी वैसी ही बनी हुई है।

आखिर हजारों साल तक क्यों खराब नहीं होता शहद?

विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के अनुसार, शहद के कभी खराब न होने और अमर रहने के पीछे उसकी खास प्राकृतिक रासायनिक संरचना (Chemical Structure) जिम्मेदार है, जिसके मुख्य 3 कारण हैं:

  1. लो मॉइस्चर (Low Moisture): शहद में पानी की मात्रा न के बराबर यानी अत्यंत कम होती है। मधुमक्खियां फूलों से रस (Nectar) लाने के बाद अपने पंखों की हवा से उसका अतिरिक्त पानी सुखा देती हैं। पानी की कमी के कारण बैक्टीरिया (Bacteria) और फफूंद (Fungi) का पनपना नामुमकिन हो जाता है। इसके अलावा इसमें मौजूद फ्रक्टोज और ग्लूकोज सूक्ष्म जीवों के लिए प्रतिकूल माहौल बनाते हैं।

  2. अम्लीय स्वभाव (Acidic Nature): शहद का पीएच स्तर (pH Level) लगभग 4 होता है, जो कि काफी अम्लीय (Acidic) माना जाता है। मधुमक्खियों के पेट से निकलने वाले विशेष एंजाइम ग्लूकोज को ‘ग्लूकोनिक अम्ल’ में बदल देते हैं, जिससे इसकी अम्लता बढ़ जाती है और कोई भी जीवाणु इसमें जीवित नहीं रह पाता।

  3. हाइड्रोजन पेरोक्साइड (Hydrogen Peroxide): शहद में मौजूद एंजाइम समय-समय पर प्राकृतिक रूप से हाइड्रोजन पेरोक्साइड नामक केमिकल रिलीज करते रहते हैं। यह वही रसायन है जिसका इस्तेमाल मेडिकल साइंस में घावों को साफ करने वाले एंटीसेप्टिक (Antiseptic) के रूप में किया जाता है। यही वजह है कि प्राचीन सभ्यताओं में इसका इस्तेमाल चोट और जलन के इलाज में होता था।

मिस्रवासियों की सीलिंग तकनीक (Air-Tight Sealing Technology)

इस शहद को सुरक्षित रखने में सिर्फ प्रकृति का ही नहीं, बल्कि प्राचीन मिस्र के लोगों के बेहतरीन विज्ञान ज्ञान का भी बड़ा हाथ था। वे शहद को मोटी दीवार वाले मिट्टी के बर्तनों में भरकर उन पर मोम या रेजिन (Resin) की मोटी परत चढ़ाकर उसे पूरी तरह एयर-टाइट सील (Air-Tight Seal) कर देते थे।

इन जारों को पिरामिडों (Pyramids) के अंदर बेहद ठंडी, सूखी और अंधेरी जगहों पर चूना पत्थर की संरचनाओं के बीच रखा जाता था, जहां बाहरी तापमान और नमी (Humidity) का कोई असर नहीं होता था। हालिया स्टडीज से पता चला है कि इतने वर्षों में शहद के कुछ औषधीय गुण भले ही थोड़े कमजोर पड़ गए हों, लेकिन यह बिल्कुल भी जहरीला (Toxic) नहीं हुआ है। यह खोज साबित करती है कि प्राचीन मानव का ज्ञान और प्रकृति का संतुलन कितना बेजोड़ था।

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